देवी विभूति

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vibhootiprasad


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जागरण जंक्शन के प्रति हार्दिक आभार

Posted On: 18 Oct, 2012  
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भिखारी पार्टी—जिंदाबाद

Posted On: 20 Sep, 2012  
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मा को बीबी बनाओ. बहन को बीबी बनाओ. सुखी रहोगे.

Posted On: 17 Sep, 2012  
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छींटाकशी का प्रतिफल

Posted On: 16 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad

श्री संतोष जी, अक्षर अपने आप न तों शब्द बद्ध होते है. और न तों शब्द अपने आप वाक्य बद्ध. इनको जब एक निश्चित क्रम में रखा जाता है तभी शब्द या वाक्य का रूप ग्रहण करते है. इन्हें एक वाक्य में पिरोने के पहले मस्तिष्क में प्रायोजित करना पड़ता है. मस्तिष्क मनोभावों को व्यवस्थित रूप प्रदान करता है. यह रूप चाहे वाणी के रूप में हो या लेखन के रूप में मनोभावों का ही एक आकृति बद्ध परिणाम है. आप देखे होगें कि शरीर के किसी भी भाग में दर्द होने पर चेहरे पर पीड़ा स्पष्ट झलकने लगती है, चाहे लाख छिपाने क़ी कोशिस क़ी जाय. मनोभाव मन के ही भाव होते है. चाहे उनकी कितनी भी तीव्र क्यों न हो. चाहे वायु धीरे बहे या आंधी के रूप में कहलायेगा हवा ही. कोण बदलने से विचार-अर्थ में परिवर्तन ग्राह्य है. किन्तु वह बदला हुआ भी रूप विचार ही कहलायेगा. और यह स्थिति कि जब एक ही प्रसंग-विषय पर एक ही व्यक्ति कई तरह के विचार प्रस्तुत करे, भ्रमित कहलाता है. और यह स्पष्ट हो जाता है कि अमुक व्यक्ति भ्रामक है. इस प्रकार लेख से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति किस प्रवृत्ति-सिद्धांत का है. यद्यपि वह छिपाकर अपना बदला रूप प्रदर्शित करने क़ी कोशिस करता है, किन्तु बदला हुआ यह रूप भ्रम के चादर से लिपटा रहता है. जो सच्चाई के एक ही झोंके से तार तार हो जाता है. इस लिये यदि कोई अपने मनोभावों को छिपाने क़ी कोशिस करे, और दूसरी तरफ कुछ बदले विचार प्रस्तुत करे, यह स्थिर हो ही नहीं पाता है. तथा विचलन से उसका वास्तविक रूप ही अंत में प्रकट होता है. लेख के रूप में कोई व्यक्ति अपने मनोभावों-विचारों को ही लिपि बद्ध करता है. रही बात रंगों क़ी--- तों चाहे रंग कितने भी प्रकार के हो, उनका मूल श्वेत रंग ही होगा. लोग अपनी मूढ़ता के कारण उसमें भेद देखते है. ठीक इसी प्रकार इस मंच पर लोग अपने अपने विचार रखते है. लेकिन उसी में कुछ लोग उससे सहमत नहीं होते है. जैसे मै किसी और रंग को पसंद करता हूँ. और आप किसी और रंग को. चाहे हम और आप कोई भी रंग पसंद करें, उसके स्रोत में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला. यह हमारी और आप क़ी हठ वादिता है, जो एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते है. यह मेरा आप पर प्रत्यारोप नहीं अपितु आप से सम्बन्ध बनाकर नज़दीक आने का एक मार्ग है. आप मूरख है या विद्वान, यह आप क़ी संपदा है. इससे मुझे कुछ नहीं लेना देना. मै मात्र इतना ही जानता हूँ कि न तों इस मंच पर कोई मेरे से ज्यादा विद्वान है और न ही मेरे से ज्यादा मूरख. शेष लोग क्या समझते है, इससे मुझे कोई गिला-शिकवा नहीं है. लोग लिख रहे है. उनके लेख पढ़ते ही उनका असली रूप कुछ क्षण बाद विचार करने पर एक दम स्पष्ट हो जाता है. तों उससे मुझे क्या शिकायत? यह उनका रूप है. यह मेरा रूप है. इसमें कोई घबडाने या शिकायत क़ी क्या बात है? मेरे लेख पर आप ने अपना विचार रखा तों इसमे मुझे क्या शिकायत हो सकती है. यह आप का विचार है. लेख में मेरे विचार है. सबको प्रसन्नता से लेख लिखना चाहिए. और पढ़ना चाहिए. और अंत में ------"सार सार को गहि रहे----" धन्यवाद.

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad

श्रद्धेय विभूति जी ,..सादर प्रणाम मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है ,..आपके सार्थक विचारों को पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,..सार सार को गहि रहै थोथा डे उडाय !.ही सार्थक मार्ग है ,.जिसको जो अच्छा लगता है वही करेगा ,..........इस बात से जरा असहमत हूँ कि लेख या प्रतिक्रिया पढ़कर मनोभावों को समझा जा सकता है ,...मनोभाव तीव्र गति से चलते हैं ,..कोण बदलने से अर्थ में परिवर्तन आ सकता है ,कभी कभी प्रश्न ,उत्तर या लेख को लिखने समझने का सन्दर्भ जरा बदलता है तो विचारों में परिवर्तन दिखता है ,..शाब्दिक अभिव्यक्ति को सप्तरंगी लाइन मानूंगा ,..देखने के कोण में कुछ अंशों के परिवर्तन से अलग रंग झलक सकता है ,.... मैं नितांत मूरख हूँ ,.. मुश्किल से मन कुछ एकाग्र कर पाया हूँ ,. प्रयास जारी हैं ,....असहमति जताने के लिए कृपया क्षमा करियेगा ,.आपकी भावनाओं को naman है ,.. आपका सादर अभिनन्दन

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदरनीय श्री भावनाथ जी, आप निर्जीव एवं सजीव को किस उत्कृष्टता या निकृष्टता के आधार पर अच्छा या बुरा कहते है? बुरे भी तो अच्छो के नखरे सहते रहते है. पत्थर भी चुपचाप देह धारियों एवं वर्षा-तूफ़ान आदि की प्रताड़नाएँ सहते रहते है. इसके विपरीत सजीव तनिक में ही तूफ़ान खडा कर देते है. आप स्वयं देखिये, सजीव होने में कितने नखरे है? वस्त्र से शरीर के अंग ढक लो. नहीं तो लोग देखेगें तो क्या कहेगें? ऐसा लगता है जैसे किसी को पता ही नहीं है की उस वस्त्र के नीचे कौन सा अंग है? किसी को पिता कहो और उसका पैर छुओ. तो कोई बेटा है तो उससे अपने पैर स्पर्श करने का आदेश दो. यह बड़ा है, यह छोटा है. यह उंच है. वह नीच है. यह ईश्वर है. यह ज्ञान देने वाला ग्रन्थ है. मांस खाना पाप है. परिवार के सम्बन्ध एवं रिस्तो के सम्बन्ध में बंधे रहो. उसकी पूजा करो. उसका आदर करो. उससे घृणा करो. उसकी तरफ मत देखो. उससे प्रेम करो. यह सब क्या लफडा है?

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad

आदरणीय पंडित जी सादर चरण स्पर्श, आप जैसे उच्च कोटि के प्रकांड पंडित से कुछ कहने की तो हिम्मत नहीं है. किन्तु बहुत साहस कर के कह रहा हूँ. जैसा की आज भी पंडित जी लोग पूजा के पहले संकल्प में यही कहते है की- "--------------------कलि युगे कलि प्रथम चरणे-----------------" अर्थात अभी यह कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा है. इसे आप न भूलें तो अच्छा रहे. क्योकि ईश्वरवादियों ने अनीश्वर वादियों को बहुत सताया है. सतयुग, त्रेता और द्वापर इन तीन युगों की लम्बी अवधि में ईश्वर और परम्परा आदि के आड़ में समाज को बहुत ज़कड़ कर रखा है. अब कम से कम कलियुग भर तो अनीश्वरवादियों को स्वच्छंदता पूर्वक विचरण करने दें. वैसे भी यदि आप अपनी परम्परा को मानते है तो ज्योतिषियों एवं त्रिकालदर्शियो की वाणी आप को माननी ही पड़ेगी. और कलियुग के आगे आने वाले शेष तीन चरणों में अभी और भी बहुत कुछ होगा. "---------वृथा न होई देव ऋषि वाणी.-----------" आप चाह कर भी अब अनीश्वर वादियों के आगे नहीं टिक पायेगें. यह मैं आप के ही सिद्धांत एवं परम्परा के आधार पर कह रहा हूँ. वैसे मैं आप से कुछ कहने की धृष्टता किया हूँ. इसके लिए आप से क्षमा प्रार्थी हूँ.

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad

श्रीमान विभूति प्रसाद जी नमस्कार, आप ने जो आख्यान प्रस्तुत किया है वह तो बहुत भयंकर है. पता नहीं आप अनीश्वरवादी है या ईश्वरवादी. यदि आप अनीश्वरवादी है तो निश्चित रूप से आप बहुत ज्यादा पढ़ लिख गए है. जिसे संसार के माया जाल से कुछ नहीं लेना देना है. आप के लिए जन्म-मरण में कोई अंतर नहीं. जन्म मरण प्राकृतक रूप से चलने वाली एक चक्रीय प्रणाली है जिसका जहाँ अंत है वही से प्रारम्भ. और आप अपने समस्त क्रिया कलाप या व्यवहार को इस चक्र का एक आवश्यक, अविचलनीय एवं स्वाभाविक अँग मान लिए है. या दूसरे शब्दों में निर्जीव या सजीव होना आप के लिए कोई मायने नहीं रखता. और यदि आप ईश्वर वादी है, तो इससे ज्यादा तीखा व्यंग्य अनीश्वर वादियों के लिए और कुछ नहीं हो सकता है. क्योकि आप ने अनीश्वर वादियों के समाज का एक बहुत ही अच्छा एवं सर्वांगीण चित्रण कर दिया है. ईश्वर, मान्यता एवं परम्परा की सामाजिक आवश्यकता पर एक अति सुन्दर लेख.

के द्वारा: भाव नाथ भाव नाथ

श्रीमान पीताम्बर साहाब जी प्रणाम, यदि हम पशु पक्षी या जंगली जानवर बन गए तो क्या हो गया? क्या वे भोजन नहीं करते? क्या वे जन्म नहीं लेते? क्या उनकी मृत्यु नहीं होती? क्या उनका समाज नहीं होता? समाज और मान्यता प्रकृति या ईश्वर नहीं बनाते. यह समाज के सदस्य बनाते है. आप ने जीना दूभर होने की बात कही है, आप के समाज में मरना भी दूभर है. मरने के बाद भी आत्म ह्त्या का मुक़द्दमा चलने लगेगा. ईश्वर को न मानने का यही तो फ़ायदा है. जब चाहे जंगली जानवर बन जाओ. जब चाहे आदमी बन जाओ. कोई प्रतिबन्ध नहीं. कोई मान्यता नहीं. कोई ईश्वर नहीं. अनुशासन समाज को बांधता है. उसे विविध प्रतिबंधो से जाकड़ देता है. उन्मुक्तता समाप्त हो जाती है. क्या आप ने नहीं देखा है क़ि जानवरों में कोई अनुशासन नहीं, कोई मान्यता नहीं, कोई ईश्वर नहीं, कोई शर्म नहीं इसीलिए इस समाज में एक बच्चे की माँ खुले आसमान के नीचे अपने स्तनों को नंगे में अपने बच्चो को पान कराती है. और जब उसके स्तन पान से बच्चा पाल पोश कर बड़ा कर दिया जाता है तो वह उसी माँ से यौन सम्बन्ध भी बना लेता है. इतनी उन्मुक्तता आप के सभ्य समाज में कहाँ है? यहाँ तो ईश्वर एवं नियम-कायदों का भय दिखाकर माँ को महिमा मंडित कर दिया जाता है. तथा बच्चा अपनी माँ के साथ यौन सम्बन्ध का सुखोपभोग नहीं कर पाता है. ऐसे ईश्वर का क्या औचित्य? मत पड़े इन आंसुओं को देख कर भ्रम में कभी क्या पता ये गम के है या हूर सी बेगम के है?

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad




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